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Monday, 31 December 2012

कहवा चली गइलू बेटी हमार हो ---पूनम माथुर

कहवा चली गइलू बेटी हमार हो अँखिया से ओझल हो गइलू दुखवा देइके माई बाप ,भाई बहिन के रोअत छोड़िके  । सन 2012 अब त जा रहल बा हमरा तोहरा से ना मिले के संदेशवा दे के। काईसन निठुर रे सन 2012 रे हमार बेटी के निगल गइले रे। अब हम कइसे रतिया दिनिया काटब रे। हमार त करेजवा अइठ के चल गइलू हो। हम अपना के कइसे ढाढ़स बधाई हो।  तोहार तो कबनों कसूर ना रहे। नियति के काल तोहारा के खा गईल।

बेटी हो हमारा अपन कोख पर नाज बा कि तू दरिंदन से खूब लड्लू । तू त मर गइलू लेकिन ऊ दरिंदवन सब फांसी मांगत बाड़न स । डरे उ सबहन के हालत खराब । जेल मे कैदियों सबसे पीटातारन स । कुकर्म करे समय त अपना के सबसे ताकतवर समझत  रहन स । अब काहे डर लगल बा।

हमार आंखि से गंगा-जमुना बहरहल बा लेकिन तू हमार बेटी हऊ  एहसे हमारा कौवनों तरह के शरमीनदी नइखे । आज तोहरा वास्ते पूरा भारत वर्ष मे बलात्कार करे वालन के विरुद्ध कारवाई हो रहल बा। तोहार सहादत  बेजा ना जाई तोहार कुर्बानी बेकार  न होई देश भर तोहरा साथे  बाटे। अब समाज के बदले के पड़ी ।औरत के इज्जत आऊर सम्मान त देवे के ही पड़ी। समाज बदली। परमात्मा सृष्टि के रचना औरत आऊर मर्द के द्वारा ही करवावे के खातिर संसार के रचना कइले बाड़न। न कि बलात्कार के खातिर। दिमाग के विकृति के कारण ही त लोग इ सब काण्ड कर देवलन। इंका के ठीक करे के समाज मे चेतना लावे की चाही। हमरा अब कौवनों डर नइखे । बेटी हमार बहादुर रहन हिया। हम अपना बेटी के संस्कार दे ले रही।

हमार आंखि के लोर चूअल अब तब ही बंद हो जब कन्या भ्रूण -हत्या ना होई। सरकार,देश,समाज,परिवार के अब इहे दृढ़ संकल्प लेवे की पड़ी। तब हम समझब की हमार बेटी फिर से हमार कोख मे पल रहल बिया?हम तोहरा के बिदा नइखी कइले। तू त देश के बेटी हऊ। तू त युवा वर्ग के अंदर संस्कार आऊर संस्कृति के मशाल जला देहलू। तोहरा के पूरा देश के तरफ से नमन आऊर श्रद्धांजली।       

Friday, 28 December 2012

संवाद /बिना-नज़र समझ के फेर बा ---पूनम माथुर


जब हमनी के बी ए मे हिन्दी के किताब-'राजतिलक' मे एगो पढ़ले रही ऊ लिख रहल बानी -"राजा की वास्तविक शक्ति जनपद के विश्वास मे होती है न कि,शस्त्रागार मे होती है। "

दिल्ली पुलिस के लोग प्रशासक वर्ग मे कहावे ला लेकिन केतना बड़का दुर्भाग्य बा कि ऊ लोग जनता के साथे  बातचीत के माध्यम या संवाद के माध्यम से कोईयो काम ना करवा सकल हा। का हर बतिया के ऐके को जबाब बा लाठी मार दे। लाठी के आगे भूतवों भाग जाई ।' रामायण '-'महाभारत' मे पहिले दूनों पक्ष के बीच मे संवाद भइल बाटे ओकरा बाद । लड़ाई भइल बा। लेकिन आज नयका युग त कलयुग बा। जाड़ा के दिन जे तरह से पानी के फुहार से आऊर लाठी से मार-मार के परदरशंनकारी के भगावल गईल हा का इहे उचित बा। लोगन के जुड़े के कारण मोबाइल के क्रान्ति काही या इलेक्ट्रानिक क्रान्ति थोड़े ही देरी हजारों लोग एक दूसरा के साथ बाटे भले ही एकरा म नेतृत्व के अभाव होखे। पर एकता त दिखाई दे रहल बा।

जनता के गोसा त सोलह दिसंबर के घटना ही नईखे,सरकारी तंत्र के असंवेदनशील आऊर गैर जबाब देही भी बाटे । न त आज के प्रशासन मे भीड़ से निबटे के केईओ कुशलता बाटे, खाली लाठी देखावे लन जनता ऐही  से  ना सड़क पर उतर ल हिया। कोछो जनता त गोसाई रहे ओकरा त भवानात्मक संतबना चाहीत रहे। सत्ता पर काबिज लोग के ओह घड़ी काम रहे उन लोगन के संतव्ना देवे। कुछ राजद्रोही लोग भीड़ के ऊकसवा देवे लन कि देश मे गृह-युद्ध हो जाये। कालेज -स्कूल के बच्चन के बुद्धि केतना होला। बेचारा सब पीट गईलन। चूके कारवाई ठीक तरह से ना भाईल हा एह से इतना भीड़ जूट गईल आऊर हंगामा होई गईल। संवाद के माध्यम से सब काम हो जाईत न पानी के फुहार से आऊर ना लाठी से। प्यार मोहब्बत से सब काम हो सकत। भवानात्मक रूप से। संवाद के जरिये से ही अंगुलीमाल जईसन डाकू के हृदय परिवर्तन हो गईल । 

संवाद के बिना ही त कुछ लोग मर जाता दूनो तरफ के लोगन   के तकलीफ बा। वोट लेवे के बारी त राजनीतिक लोग घरे परे हाथ जोड़ के घूमेला। का एक घड़ी जब देस मे अइसन स्थिति बाटे त उन लोगन के मुंह काहे बंद बा। ऊ लोग के नेतृत्व करके चाही राजनीतिक नेतृत्व होवे चाही। खाली कुर्सी चाही। देश तो आपन  बा -जाति धर्म मे त ना बाटे के चाही। सभे राजनीतिक दल के अपील करे के चाही की अइसन घड़ी मे शांति बनावे चाही। ना त दुश्मन हावी हो जाई। देश के कुछ गद्दार यही चाह रहल बा। लड़ाई लगा के आपन उल्लू सीधा कर रहल बा।  आज के संदर्भ मे जेतना कांड  हो रहल बा। सब संवाद के अभाव के कारण ही बा। एगो त जेनरेशन गैप हो गईल बा। माहतारी बाप के बाल बच्चा से कोईओ मतलब नई खे । पैसा आऊर पैसा कमाए के धुन लागल बाटे।

दादी -नानी  के किस्सा कहानी खत्म हो गईल बा। लॉरी त न जाने कहअवा छूट गईल बा। एकरा मे बहुत बड़ा संदेश रहे जे छोट बच्चा के दिमाग के अन्तर्मन पर पडत रहे । अंजाने मे ही चरित निर्माण भी धीरे-धीरे होत रहे। आज के बच्चा भूखे रोअत रोअत सुत जाला । महतारी बाप काम पर से लौटिए तवे तक बचवा सिसकते-सुबकते सुत जाला। न ओकरा पास प्यार बाटे न संवाद बाटे न केहु के गोदी बाटे । सही रास्ता दिखावे वाला कोई नईखे । बरगर-पिज्जा खा आऊर जिय। कोई ओ कहबा जा रहल बा कोई ओ मतलबे नई खे । हाय पइसा पइसा।

आज के युग मे फिर से दादी  नानी के युग के आव्हान करे के चाहि। फिर से दादी- नानी के किस्सा-कहानी के माध्यम से नीति आऊर  नैतिक शिक्षा के जमाना लौट आई ,अपराध रुकी । बड़ा-बूढ़ा समझ आऊर नजर के बात करीहे। आज फिर वही गोदी लौटिके बच्चन के चाही। आधुनिक सिनेमा ,आर्केस्ट्रा गाना के कम करके फिर से पुरनका सिनेमा के लावे के चाही। जइसे -प्यासा,चित्रलेखा,दो आँखें बारह हाथ,हकीकत,जाग्रति,दुश्मन जइसन सिनेमा देखावे के चाही। नुक्कड़ नाटक के माध्यम से भी जनता मे जाग्रति फेलावे के चाही । सम्राट अशोक के भी त हृदय परिवर्तन हो गईल रहे। त फिर हर इंसान मे इंसान बनावे के नजरिया होखे के चाही। एक गो गाना बाटे-"इंसान की औलाद हो इंसान बनो ,न हिन्दू बनो न मुसलमान बनो"।

शरीर के खातिर खाना पानी चाही । त मन-आत्मा  के खातिर भी त संस्कार रूपी भोजन देवे के चाही । ई कर्तव्य देशवासी,समाज,घर-परिवार,अड़ौसी-पड़ौसी के बाटे। गलत शिक्षा के कारण ही सब दूरगुन फेलल बाटे। आई हम सभे इहे दृढ़ संकल्प लीही की संवाद के माध्यम से लोग के बदले के कोशिश करब। 


Saturday, 22 December 2012

का कहीं कुछो समझे नइखे आवत---पूनम माथुर


का कहीं हमरा त बुझाते नइखे । एगो शास्त्री जी जिंनकर नाम श्री राम रत्न बाटे। अब उनका से मिलले हमरा पाँच छह साल हो गईल बा। ऊ  हमरा के 'बिटिया' क़हत रहन। हमारा घरे ज्योतिषी सलाह लेवे के खातिर आवत रहले कि कौवन दिन से प्रोग्राम रखी की सात दिन के प्रवचन ठीक से ठीक चल सके कवनों विघ्न त ना होवे। हमार पति से पूछे आवत रहवन एहि से  जान पहचान  हो गईल रहे ।

उन  कर बात हमारा जेहन मे बार-बार उठ रहल बा  आज जे ई सब कांड हो रहल बा। उ क़हत रहलन कि महिला मे बाइलोजिकल अंतर नइखे भावना के अंतर बाटे  कि ऊ महतारी,बहिन, भुआ ,दादी,अम्मा,नानी,काकी,बीबी,बेटी के नाम से जानल जा ला। अगर भावना खत्म हो गईल त सब खत्म हो गईल । भावना के चलते ही त आँख के पर्दा बाटे ना त सब खत्म।

दिल्ली मे जे कांड हो गईल हा ओकर त सीधा संबंध भावना के खत्म हो गईला के कारण ही बा। दिल्ली का दुनिया के हर कोना मे आज बलात्कार हो रहल बा। लड़की के घरे से निकलल मोसकिल हो गईल बा। एक तरफ त तरक्की एतना हो गईल बा कि लड़का -लड़की बराबर बा। संविधान मे भी संशोधन करे के खातिर आवाज उठ रहल बा। पर संस्कार कहाँ कोई अपना घर पर दे रहल बा। संस्कृति संस्कार के बात खाली भाषण बाजी ,समाचार पत्र,लेख,ब्लाग,अउर मीडिया मे बतावल जा ला।परंतु घरे पर अपना बेटा के कोई कुछ कहे ला  कि तुअ गलत काम मत करीह । (बेटा हव सब ठीक बा रात बिरात आव जा कुछ भी करब तोरा मे कोई दोष नइखे तु त कुलदीपक हव )। गलत व्यवहार आउर नीति के कारण पुरुष वर्ग महिला वर्ग पर हावि बा। समझदारी के बात आजकल गार्जियन लोगन के बतावे के चाही । कवन   गलती बा इहों बतावे के चाही। रेप -रेप सुन रहल बा आज के लोग रेप के उल्ट के पढि परे-परे हो जाई । एकरा मे कौनों   दुर्घटना न  होई। आज कल हमनी के देखेली कि पढे वाला लडिका लड़किन सब एक दूसरे के हाथ हाथ डालते जा रहल बा लोग एक दूसरे के कांधा पर थपकी दे रहल बा ।दुनिया देख रहल बा का इहे मार्यादा बा।का बच्चा का बूढ़ा सब देख रहल बा ,इहे जमाना आ गईल बा। आज कल हटे-हटे के जगह पर सटे-सटे हो गईल बा। त दुर्घटना त होना ही बा। तरक्की के जमाना बा। कोई कुछ नइखे कह सकत। कहब त पीटा जईब ।

ऐतना होई के बावजूद भी बलात्कार जइसन घटना ना हो के चाही। कुत्ता जइसन हड्डी पर टूट पड़े ला। तू उहे हव का? तू त इंसान हव । मानव होवे  के तनिक  गुमान करअ ।

हमरा   घरे के सामने भागवत हो रहल बा।  कवनो   औरत सुंदर देखे मे लागतिआत  त लोग घूर-घूर के ओकरा के देखे लागे ला। का पब्लिक के भगवान मे मन लागेला कि इहे सब कुलही देखे मे मन लागेला । पूजा करत लोग के ध्यान कहीं आउर बा। आऊर त आऊर भगवान के चरितर  हनन कि कृष्ण भगवान गोपीन के कपड़ा लेके कदम के पेड़ पर चढ़ि गईलन नदी से गोपी तू लोग बाहर निकल तबे कपड़ा दे हव । जरा सोंची कि भावना आऊर भगवान के  ऐतना नीचे गिरावट। हम त पूजा-पाठ मे न जाईला एक तरह से बहिष्कार। हर जगह नारी के साथे अइसन व्यवहार बा तनि सोची। समझे के काम बा अपन-अपन घर के सुधारी तब ही जन-कल्याण बा। महिला के उद्धार बा। हल्ला हंगामा से का होई जे कर इज्ज़त लुट गइल का वापस आई?भगवान से प्रार्थना करी कि ई लोगन के तबीयत जल्दी से जल्दी ठीक हो जाए।आऊर समाज मे ए तरह के लोगन के साथ सामान्य व्यवहार होए। आज के संदर्भ मे जरूरत बा अपना घर के व्यवहार आऊर वातावरन बनावे कि टी वी ,विदेशी कल्चर आऊर  कंप्यूटर से काम ना चली। व्यवहार से घर समाज चली। देश भी बनी।

महतारी ,बाप ,गुरु आऊर समाज के ईहे कर्तव्य बा लड़का- लड़की के   सही शिक्षा दिहल जाए।  तब ई सब घटना पर रोक लगी।

 

Saturday, 8 December 2012

कुछ लोग ---पूनम माथुर

बुधवार, 16 नवम्बर 2011

कुछ लोग

श्रीमती पूनम माथुर 
कुछ लोग अपने को बड़ा मानते हैं ।
श्रवण कुमार को सब लोग जानते हैं।
सारे लोग उस पुत्र का लोहा मानते हैं।
यह सब लोग जानते हैं।
इनको किस्सा-कहानियाँ मानते हैं।
आज कल लोग  ऐसा करना नहीं जानते हैं।
तभी तो वृद्धाश्रम ,बूढ़े लोग जाने को मानते हैं।
हर कोई बूढ़ा होता ,क्या लोग नहीं जानते हैं।
संसार एक रहट है,क्या लोग नहीं मानते हैं।
हर सुबह के बाद शाम होती है,
क्या लोग नहीं जानते हैं।
पर अपने को सब बड़ा ही मानते है।
आना-जाना है,सब जानते हैं।
सब मिट्टी है,सब मानते हैं।
यह सब लोग जानते हैं।
परंतु अच्छी सीख नहीं मानते हैं।
बाद मे पछताना जानते हैं।
अच्छे कर्म होते हैं मानते हैं।
पर उन्हें करना नहीं जानते हैं।
कुछ लोग दूसरों को आंधी मे उड़ाना सही  मानते हैं।
कुछ लोग दूसरों को लोहे का चना चबवाना जानते हैं।


(पूनम माथुर)
 
 
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  • रश्मि प्रभा... a year ago

    कुछ लोग दूसरों को आंधी मे उड़ाना सही मानते हैं।
    कुछ लोग दूसरों को लोहे का चना चबवाना जानते हैं।... दुखद है , पर सत्य है
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    sushma 'आहुति' a year ago

    prabhaavshali abhivaykti...
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    कुमार राधारमण a year ago

    यही नीयत है
    यही नियती है
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    डॉ॰ मोनिका शर्मा a year ago

    सार्थक विचार .....
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    ZEAL a year ago

    bahut sundar rachna.
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    डॉ टी एस दराल a year ago

    बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना ।
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    जाट देवता (संदीप पवाँर) a year ago

    सही बताया है आपने।
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    Bhushan a year ago

    सच ही लोग बहुत ज्ञानी हैं. सब कुछ जानते हैं.......परंतु मानते कहाँ हैं.

Monday, 3 December 2012

विश्व शौचालय सम्मेलन -भारतीय महिला के भागीदारी

भोरे भोर आज अखबार मे ई समाचार पढ़ के इतना अच्छा लागल हा कि डरबन सम्मेलन मे हिस्सा लेवे खातिर मइला ढोवे वाली महिला राजस्थान के अलवर ज़िला  के ऊषा आऊर रजनी आऊर ज़िला टोंक के डाली परवाना के नाम तय करल गईल बा। ई लोग विश्व शौचालय सम्मेलन मे हिस्सा लिहें। गैर सरकारी संगठन 'सुलभ इन्टरनेशनल' के विनदेश्वरी पाठक  के अगुआई मे हो रहल बा । दिसंबर के पहिलका हफ्ता मे सम्मेलन मे ई बतावल जाई कि शौचालय के नयका तकनीकी का बा आऊर मैला ढोवे के खतम करे पर चर्चा होई। पाठक जी के अनुसार ई महिला लोगन माथा पर से मैला ढोवे के काम से मुक्त करावल गईल बा आऊर पाँच दिन के सम्मेलन मे भाग लेवे के बाद डरबन मे जइहे जहवां पर एक सदी पहले महात्मा गांधी ठहरल रहन ओहे ले जाईल जाई । सुलभ के अनुसार ई महिला लोगन के ई काम से मुक्ति मिल गईल बा आउर ई लोगन के जीवन यापन करे खातिर रोजगार के रूप मे अचार,पापड़ ,बड़ी,आऊर नूडुल्स बना के काम करके आजीविका चल रहल बा। पाठक जी के अनुसार ई तरह के वंचित महिला लोग के समाज के मुख्य धारा से जोड़ कर के उनका भीतर सम्मान से जिये के भावना जाग्रत करे के बा। ई सभ्य समाज समाज मे आज भी मैला ढोवे जईसन शर्मनाक कुप्रथा के खतम करना बहुत ज़रूरी बा। काहे कि आपन  गंदगी दूसरा से उठवाना कहाँ तक वाजिब बा। ज़रा सोंची । का रऊरा  दूसर के गंदगी उठाई ब ?

मानव के विवेक शील प्राणी काहल जा ला। का ए ही विवेकशीलता के परिचय बा?हम सब लोगन से पूछत बानी । इ आपन समाज के का हो गईल बा?

हिंदुस्तान ,लखनऊ,03-12-2012


Wednesday, 28 November 2012

गुरु नानक जयंती ---पूनम माथुर

पावन आज के दिन बा। गुरु नानक जयंती के। आज के दिन के लोग गंगा-स्नान के नाम से भी जाने लन। गुरु जे होवे लन ऊ  त अंधकार से मिटा के प्रकाश मे ले जावे के बतावे लन।लेकिन आज के दुनिया मे लोग गुरु के मतलब दूसर बना देवे ला। गुरु मन के उजाला के प्रतीक बा। और गंगा-स्नान भी केतना मिलेला। नहइब त तन के सफाई होई। परंतु गंगा-स्नान से मतलब तन-मन दूनो के सफाई मे बा। गंगा-स्नान करके बाद लोग दान-पुण्य करे ला। इ दान-पुण्य के   मतलब अपना मन के द्वार खोल। ताकि जे जरूरत मन्द बा ओहरा के आहार मिल सके ओकरा  कोई ठिकाना मिल  सके। परंतु आज के जुग मे त दान दे के लोग पत्थर पर मंदिर मे नाम लिखवावे ला। ताकि आवे  वाला लोग उंकर नाम के जान सके। वर्तमान मे जेकरा जरूरत बा ओकरा के त ना मिल सकी। अब देखि लोगन जेकरा गरीबी के कारण पढ़ाई-लिखाई मे आगे बढ़े के मौका नइखे मिलला ओकरा के मदद करे। ताकि कोई इंसान बन सके। सही शिक्षा के अभाव के कारण आज मानव के अन्दर चोरी,डकैती ,हर तरह के अपराध हो रहल बा। आज देश मे चाहे नेता होइबे चाहे अभिनेता होइबे,चाहे शिक्षक होइबे,चाहे पुलिस हर कोई हाय हाय मचावे  ला । जेकरा कारण इतना तबाही बटुये । अगर हर कोई जमा न करे त धन त दुनिया मे एतना बाटे कि कोई व्यक्ति भूखा -नंगा ना रही। हरके हर कमी पूरा होई। पर हम आगे हम आगे के चक्कर के कारण आज एतना दुनिया खराब हो गईल  बा-खून खराबी पर उतर आइल बा।

 हर कोई के एक  दिन त   मर ही के बा। काहे के बम-गोला बरसा के दहशत पैदा करे। अपना बुद्धि आऊर क्षमता के आधार पर सब के सब कुछ मिले के चाहे । तोरा मोरा हाय हाय आपन  आपंन लुकावल छिपावल ही घातक हो रहल बा। अखबार मे छपल हम सुनले रही। एक गो बूढ़ा आदमी के पास सोना के गिन्नी रहे। ऊ जब बेमार पड़ल  त ओकर पड़ौसी ओकरा के देख भाल करत रहे। पर ऊ जब मर गईल त ओकर दाह संस्कार भईल। सब लोग क़हत रहे की जरूर पड़ौसिया ओकर पईसा  के लालच मे मदद करत  रहे और सेवा-सुश्रूषा करत रहे। पडौसी त मानव भावना से करत रहे। पर ओकरा बड़ा दुख भईल । ओकरा के जहवा जलावल गईल रहे ओकर राख़ ऊलट पुलट  के देखलस तब ओकरा पता चलल की बूढ़ा हलुआ मांग ओकरा अपन सोने के गिन्नी निगल गईल  रहे। जब तक सरीर रहे  तब तक ही सब कुछ लुका सकल । परंतु मरला के बाद सब कुछ इहे रह गईल । ई सच्ची कहानी के तअ हमनी के इहे सीखे के चाहे। जमा ओतने करे के चाही  की हारी-बीमारी या आपत काल मे काम आ सके। जब सब कुछ इहे रह जाई त काहे जादे जमा आऊर काहे लुकावल छिपावल ।   समाजवाद के भावना से जीये  चाहे। जेकर नारा होएके चाहे त " सबका सबके लिए "। जहां पर हमार-हमार  के भावना होई होही मे खतरा बाटे । मन के पवित्र करे के चाही।  एही से गाना ई गाना पर ध्यान देवे के चाही ---'तोरा मन दर्पण कहलाए,भले बुरे सारे कर्मों को देखे और दिखाये '। एही से हमरा जाने मे आज के दिन गंगा-स्नान और गुरु नानक जयंतीके नाम से जानल जा ला।

Monday, 26 November 2012

दो कवितायें

शुक्रवार, 25 नवम्बर 2011


पूनम की दो कवितायें


"तीन"



(श्रीमती पूनम माथुर )
सम से समता 
निज से निजता  
एक से एकता

लघु से लघुता

प्रभु से प्रभुता 

मानव से मानवता

दानव से दानवता

सुंदर से सुंदरता 

जड़ से जड़ता

छल से छलता

जल से जलता

दृढ़ से दृढ़ता  

ठग से ठगता

कर्म से कर्मठता

दीन से दीनता

चंचल से चंचलता

कठोर से कठोरता

समझ से समझता

खेल से खेलता

पढ़ से पढ़ता

इस का विधाता

से रिश्ता होता

ये दिल जानता

ये गहरा नाता

गर समझना आता

अपना सब लगता

मन हमारा मानता

दर्द न होता

जग अपना होता

विधाता का करता

गुणगान शीश झुकाता

मानवधर्म का मानवता

से सर्वोत्तम रिश्ता

सेवा प्रार्थना होता

सबसे अच्छा होता

ये गहरा रिश्ता

अगर सबने होता

समझा ये नाता

दिलों मे होता

रामकृष्ण गर बसता

संसार सुंदर होता

झगड़ा न होता

विषमता से समता

आ गया होता

विधाता से निकटता

तब हो जाता

जग तुमसा होता

जय भू माता 



        * * *
(नोट- यह कविता 'जो मेरा मन कहे ' पर प्रकाशित हो चुकी है)


 देखा एक बच्चा 




हमने एक छोटा बच्चा देखा 
उसमे पिता का नक्शा देखा 
दादा दादी का राजदुलारा देखा 
उसकी माँ ने उसमे संसार का नजारा देखा 

अपनों ने उसमे अपना बचपन देखा 
बच्चों का उसमे सजीव चित्रण देखा 
इनकी मस्तानी और निराली दुनिया को देखा 
प्रेम मोहब्बत की दुनिया को देखा 

सबसे अच्छी दुनिया को देखा 
इनकी भोली सूरत के आगे दुश्मनों को भी झुकते देखा 
दुश्मनों को भी इनको चूमते देखा 
इनको गैरों को भी अपना बनाते देखा 

इस फरिश्ते के आगे सबको नमन करते देखा 
सुख-दुख भूल सबको इनमे घुल मिल जाते देखा 

(यशवन्त के जन्मदिन पर उसको माता पूनम का आशीर्वाद)
 
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    Bhushan a year ago


    सरल शब्द और सशक्त भाव की सुंदर कविताएँ. यशवंत जी को जन्मदिन की कोटिशः हार्दिक शुभकामनाएँ.



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    मनोज कुमार a year ago


    अलग और अनूठे फॉर्मेट में लिखी गई सुन्दर रचना।



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    डॉ॰ मोनिका शर्मा a year ago


    बेहतरीन रचनाएँ ..माँ के आशीष रूपी शब्द मन को छू गए ....



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    sushma 'आहुति' a year ago


    दोनों ही कविताएं.... बेहतरीन शब्द सयोजन है.....



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    Rakesh Kumar a year ago


    अरे वाह! बहुत सुन्दर.
    दोनों कवितायें लाजबाब हैं.
    बहुत बहुत बधाई.



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    Akshitaa (Pakhi) a year ago


    दोनों कविताएँ बहुत अच्छी लगीं..बधाई !!



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    डॉ टी एस दराल a year ago


    ममतामयी दूसरी रचना बहुत बढ़िया लगी .
    पहली में किया गया प्रयोग भी अच्छा है .



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    रश्मि प्रभा... a year ago


    इस फरिश्ते के आगे सबको नमन करते देखा
    सुख-दुख भूल सबको इनमे घुल मिल जाते देखा ... isse badhker aashish nahin koi , na hi yash ko zarurat hogi ... punam ji - aap bahut achha likhti hain



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    अनुपमा पाठक a year ago


    दोनों कवितायेँ सुन्दर हैं!

    माँ का शब्दाशीश अभिभूत करने वाला है!



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    सदा a year ago


    दोनो ही रचनाएं बहुत बढि़या ... शुभकामनाओं के साथ आभार ।

Sunday, 4 November 2012

बदलल रूप खुशी के

बुधवार, 30 नवम्बर 2011

बदलल रूप खुशी के

(श्रीमती पूनम माथुर )

हमार घर के सामने मकान बन रहल बा सूबेरे से साँझ तक मजदूर मकान बनावे मे लागल रहेला।
ओकर मालिक खड़ा होकर निगरानी करे ला काम  करि त पईसा मिली सबेरे से साँझ बिता लेवे ला । ओकर त दिमाग औरु देह दूनों लागल रहे ला। अफसर  लोग त इहै मजदूर के बनावल बड़का-बड़का आफिस मे कांम करेलन और तनखाह औरु जी पी एफ हर चीज के सुविधा बा। लाखों मे खेल रहल बाड़न -गाड़ी ,मोटर,बंगला सब कुछ उन  लोगन के खातिर लेकिन जे हाड़ -पीट के मकान बनावे ला मजदूर ओकर कोनों कदर नई खे यीहे समाज बा ओकरा के गोड़ के धूर समझल जा ला। समानता,एकता ,भाई -चारा ,ऊंच-नीच ,जाति-पांत मिटावे खातिर संत-म्हातमा पैदा लेलन लेकिन यी सब बात पर कोई के असर भईल? घर के नीचे सड़क पर एगो आदमी बतियावत जात रहे-"जब हम सम्पन्न तो खुदा भी प्रसन्न" जब इन्सान के अंदर यीहे भावना आ गईल तअ समाज के उठान कहाँ से होई। यी तो संमाज ऊंच-नीच पईसा औरु बेपईसा बालन के बीच बट गईल बा। एगो के बोरा मे पईसा रखे के जगह नई खे एगो के हाथ खाली । येही से शोषक औरु शोषित शुरू हो रहल बा।

एगो साइंटिस्ट हमार घर के बगल मे रहेलन ऊ मजदूर लोग की झोंपड़ी पुलिस के द्वारा जलावे के पर कहलन -"आप के घर के आगे झोंपड़ियाँ होतीं तो आपके घर की रौनक नहीं खराब होती क्या?पुलिस ने इन झोंपड़ियों को जला कर अच्छा ही किया"। कीचड़ मे जब गाड़ी के पहिया फंस जाई यीहे मजदूर हांथ लगा के गाड़ी के पहिया निकाल देवे ला ओकर इनके दिल मे यीहे जगह बा। सच्चे  मे  शरम से गड़ जाये के चाँही अइसन मानुष के त ।
तू आदमी हव की जानवर ।

एगो सिनेमा के कलाकार के पूर्वज लोग डाकू रहन ऊ डाकू लोग अइसन रहन की गरीब-मजलूम  बेसहारा मजदूर वर्ग के लोग के अमीरन से पईसा लूट के ई  तरह के लोगन के मदद करत रहन । आज की परिस्थिति मे  ओइसन लोगन के बहुत जरूरत बाटे। तभी समाज के ई पईसा के ठेकेदारन की ऐसी-की -तैसी हो जाई,  ओइसन  दुष्ट लोग थर-थर काँपे लागी। हम त ऐसे डाकू लोगन के श्रद्धा से प्रणाम कर अ तानी । अइसन लोग समाज मे आकर उच्च्श्रंखलता बंद करे ताकि एक सभ्य औरु बढ़ियाँ समाज के निर्माण हो सके ।

का कहीं दिल मे तो बहुत बात बा। सोंचते-सोंचते लागे ला की दिमाग फट जाई यी दुनिया के लोगन के देखला पर एगो स्लोगन  याद आवे ला -"हम दो ,हमारे दो" ई जगह मे होये के चांही " हम दो -बांटेगे खुशियाँ दसियों को"। ई तरह के लोगन के मालिक शराब पिया के पिये वाला बना देवे ला ताकि अगर ऊ जागरूक होई तो हमार बात न मानी औरु हम ओकरा ऊपर राज न कर सकब । बेचारा जब एक प्याली चाय के ऊपर दिन भर काम करे ला औरु साँझ के जब पईसा मिली तब थोड़े-थोड़े समान खरीद के खाना बनावे ला तीस दिन के राशन-पानी त ओकरा पास नई खे । सुबह और साँझ भर के बा। देखि ला बहुत मजदूर काम न मिले ला तो लौट जाला । हमार बाबू जी त दिवंगत हो गइल रहलन कुछ बरस के बाद जब हम अपना नैहर गइनी त हमार माई ई कहलस  जान त रे बेटा थोड़े दूर पर एगो मजदूर के परिवार साँझ के नहा-धो के खाना खाय खातिर बईठर रहे की घर के मालिक आवे त खाना शुरू होवे। ओकरा घरे मछरी औरु भात बनल रहे बच्चा सब के खुशी के कोई ठिकाना न रहे की आज बड़ी दिन बाद माई-बाबू के संग मछरी औरु भात मिल के खाइब। ओकर घर मे डिबरी जरत रहे ओही से घर मे रोशनी हॉत  रहे सब बड़ी खुश ,एतने देर मे एगो बिलैया मछरी खाय के खातिर कड़ाही पर कूदल डिबरी गिर गईल औरु किरासन तेल बिखरा गइल आग लग गइल अब त सारे घरे मे आग फ़ेल गइल औरु विकराल रूप  ले लेलस हाय-पुकार मच गइल के खा ल मछरी औरु भात ?बचावा -बचावा आवाज कान मे आ गइल गर्मी के दिन आग इतना भयंकर रूप ले लेलस थोड़े देर मे काम तमाम । हो गइल सब के सब स्वाहा । हमार बूढ माई कहअते-कहअते एतना रोये  लागल की ओकर तबीयत खराब हो गइल। सोंची ल त लागे ल की यीहे जिंदगी मजदूर औरु गरीब वर्ग के बा ?रउआ सब बतायीं की एकर का उपाय होये के चांही?


(29 तारीख के 'हिंदुस्तान' अखबार मे 40 झोपड़ी मे आग लागे के खबर छापल पढ़ के हम्ररा एक बैग दिमाग मे पुरान घटना -दुर्घटना जे कहीं ऊ याद पड़ गईल ,एही से यी  लिख रहल  बानी ; पढ़ के त मन अजीब हो जाला लेकिन इंसान का करे?---पूनम माथुर)  

6 टिप्‍पणियां:

  1. आपके लेखन में स्वाभाविकता और सहजता है...
  2. बधाई ||

    सुन्दर प्रस्तुति ||
  3. एक तो सच्ची बात ,ऊपर से भाषा की मिठास !
    बहुत सुन्दर !
  4. समय के साथ सब कुछ बदलता है.... फिर दिखावे की तो कहें ही क्या ..?
  5. "ई तरह के लोगन के मालिक शराब पिया के पिये वाला बना देवे ला ताकि अगर ऊ जागरूक होई तो हमार बात न मानी औरु हम ओकरा ऊपर राज न कर सकब ।"
    इन पंक्तियों में आपने समाज के असली रूप को सामने ला दिया है. बहन, आपको नमन.
  6. भूषण भाई साहब नमस्ते,

    मै तो आपकी छोटी बहन हूँ ,मुझे तो आपका आशीर्वाद चाहिए,उसे बनाए रखिएगा ।

    पूनम माथुर

Thursday, 18 October 2012

कुछ तो लगता है

सोमवार, 24 अक्तूबर 2011

कुछ तो लगता है












त्योहारों से  मुझे अब डर लगता है
बचपन बीता सब कुछ सपना लगता है
अब सब रिश्ते एक छलावा लगता है
छल-बल दुनिया का नियम अब सच्चा लगता है
कौन किसका सबको अब अपना अहंकार अच्छा लगता है
ऊपर उठाना-गिराना अब यही सच्चा धर्म लगता है
खून-खच्चर अब यही धर्म सब को अच्छा लगता है
त्योहारों का मौसम है सब को 'नमस्ते' कहना अच्छा लगता है
दुबारा न मिलने का यह संदेश अच्छा लगता है
अब तो राम-रहीम का ज़माना पुराना लगता है
बुजुर्गों का कहना यह बेगाना लगता है
अब तो मारा-मारी करना अच्छा लगता है
अब तो यही ठिकाना-तराना अच्छा लगता है
अब तो खुदगरजी का जमाना अच्छा लगता है
अब तो गोली-बारी चलाना अच्छा लगता है
नैनो से तीर चलाने का ज़माना अब तो पुराना लगता है
भ्रष्टाचार और घूस कमाना अच्छा लगता है
यह तो बदलते दुनिया का नियम अच्छा लगता है
शोर-शराबा करना अच्छा लगता है
हिटलर और मुसोलिनी कहलाना अच्छा लगता है
हिरोशिमा की तरह बम बरसाना अच्छा लगता है
अब गांधी-सुभाष बनना किसी को अच्छा नही लगता है
शहीदों की कुर्बानी अब तो गुमनामी लगता है
मै आज़ाद हू दुनिया मेरी  मुट्ठी मे कहना अच्छा लगता है
अपने को श्रेष्ठ ,दूसरे को निकृष्ट कहना अब तो अच्छा लगता है
मै हू,मै हू ,मै-वाद फैलाना अब तो अच्छा लगता है
चमन को उजाड़ना अच्छा लगता है
अब तो दुनिया का मालिक कहलाना अच्छा लगता है
चिल्लाना और धमकाना अब अच्छा लगता है
बेकसूर को अब कसूरवार बनाना अच्छा लगता है
न्यायालय मे झूठा बयान देना अच्छा लगता है
अब तो यही फसाना अच्छा लगता है
अब तो यही चिट्ठी बांचना अच्छा लगता है
औरों को सता कर 'ताज' पहनना अब अच्छा लगता है
अब तो झूठ को सच कहना अच्छा लगता है
दिलों पर ठेस पहुंचाना अच्छा लगता है
किसी ने कहा-क्या यह शर्म नहीं आती
यह सब करना क्या अच्छा लगता है?

(पूनम माथुर)


8 टिप्‍पणियां:

  1. आजकल तो यही सब है ..... समसामयिक पंक्तियाँ
  2. सुन्दर प्रस्तुति |

    शुभ-दीपावली ||
  3. कौन किसका सबको अब अपना अहंकार अच्छा लगता है
    सच है!
  4. उलट चाल चल रही दुनिया में ऐसा होना ही था. बढ़िया कविता.
  5. आईये इस दिवाली पर इन सब अच्छा लगने वाली बातों को तिलांजलि दे दी जाये ।

    दिवाली की शुभकामनायें ।
  6. बढ़िया कविता..** दीप ऐसे जले कि तम के संग मन को भी प्रकाशित करे ***शुभ दीपावली **
  7. झूठ को सच कहना और सच को झूठ...बहुत कुछ समेटे हुए आज के समय की कविता है ..
    आपको और आपके परिवार में सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ।
  8. आपको और आपके परिवार को हम सभी की ओर से दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ.

Saturday, 6 October 2012

भगवान् का मंदिर

बृहस्पतिवार, 17 फरवरी 2011

भगवान् का मंदिर

लेखिका-श्रीमती पूनम माथुर

यह संसार भगवान का सबसे सुन्दर मंदिर है.हम सब (प्राणी और वनस्पति जगत)उस मंदिर क़े नस और नाडी हैं.अगर हमें उस मंदिर की सेवा करनी है तो हमें अपने माता-पिता और सभी जनों को सुखी और खुश रखना होगा.प्रत्येक प्राणी क़े दुःख -दर्द को समझना होगा.पर्यावरण और वातावरण को भी शुद्ध रखना होगा.
प्रभु ने हमें बेशुमार दौलत दी है जैसे-स्वास्थ्य,शरीर,धन,परिवार,समाज,राष्ट्र सब कुछ दिया है.अगर हम उसे देखना चाहते है,उसे समझना चाहते हैं,अपने अन्दर उसे पाना चाहते हैं तो हमें उसके लिये कुछ करना भी चाहिए.इसलिए हमें उसकी बनाई हुई दुनिया या सृष्टि में दया और प्रेम का भाव भर देना चाहिए.तभी हम सही अर्थों में परमात्मा की स्तुति कर पायेंगे और अपने को धन्य समझ सकेंगे.तभी इस दुनिया से हिंसा का नामोनिशान मिट पायेगा.तब संसार स्वर्ग की तरह हो जायेगा.

तब  हम शांति और सद्भाव,दया और प्रेम उसके बनाए मंदिर में लगातार प्राप्त करते रहेंगें.  मानवता तभी ऊपर उठेगी जब न जाति-पति का भेद-भाव हो और न धर्म का बंधन,न कोई उंच और न कोई नीच हो,न कोई बड़ा न कोई छोटा,न कोई गोरा न कोई काला का भेद.

सब में एक ही परम-पिता समाया हुआ है चाहे उसे किसी भी नाम से पुकारो .न कोई उसका धर्म है न कोई उसकी भाषा न जाति.उसकी तो बस एक ही भाषा और धर्म है,प्यार-दया और प्रेम की भावना.
हमें परमात्मा क़े इस वरदान को यूँ ही नहीं गवाना चाहिये.इस वरदान का हम सभी स्वागत करें  जो हमें लगातार शान्ति सद्भाव को आशीर्वाद क़े रूप में प्रदान करता रहता है.भगवान् की बनाई हुई इस प्यारी सी दुनिया को हम हरा-भरा रख कर सुख-समृद्धी से भर सकते हैं,मानवता और एकता क़े बंधन में जोड़ कर.क्योंकि मनुष्य एक विवेकशील प्राणी है.जन-कल्याण की भावना की ज्योत अपने अन्दर जगाएं.यही सच्चे अर्थों में इस भगवान् क़े मंदिर की सबसे बड़ी पूजा होगी. 
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7 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत नेक विचार ।
    कलयुगी मानव को सदाचारण की बहुत ज़रुरत है ।
    आभार इस लेख के लिए ।
  2. उत्तम विचार, इन्सान एक्चुअली इसी भंवर में फसा रह जाता है !
  3. उत्तम विचार
  4. बहुत सार्थक और सकारात्मक विचार हैं....सभी के लिए अनुकरणीय.....
  5. यह संसार एक मंदिर है।
    सब में एक ही परमपिता समाया हुआ है।
    प्यार, दया और प्रेम की भावना ईश्वर का वरदान है।

    ये श्रेष्ठ विचार सभी के मन में प्रस्फुटित हों।
  6. namaste mam,
    maine apka blog padha, ye nishchit hi ek shandaar blog hai. aapke jitana to nahi par ek choti si koshish maine bhi ki hai blog likhane ki. waqt nikal kar use bhi ek baar dekhane aur us par comment dene ka prayaas karen
    journalistkrati.blogspot.com

तुम चाहो तो ......

बृहस्पतिवार, 30 दिसम्बर 2010

तुम चाहो तो ......

[श्रीमती पूनम माथुर,द्वारा]

तुम चाहो तो,घृणा को प्यार में बदल दो.
तुम चाहो तो,दुःख को खुशी में बदल दो..
तुम चाहो तो,वीराने को बहार  में बदल दो.
तुम चाहो तो,पतझड़ को बसंत में बदल दो..
तुम चाहो तो,हैवान को इन्सान में बदल दो.
तुम चाहो तो, गरीबी को अमीरी में बदल दो..
तुम चाहो तो,मौत को ज़िंदगी में बदल दो.
तुम चाहो तो,अन्धकार को प्रकाश में बदल दो.
तुम चाहो तो,अज्ञानी को ज्ञानी में बदल दो...

6 टिप्‍पणियां:

  1. जीवन में जहाँ चाह होती है वहाँ राहें खुद ब खुद बनती चली जाती हैं.प्रेरणादायक बहुत ही अच्छी कविता .
    पूनम जी इस कविता के प्रकाशन हेतु बधाई और हमने तो पहली बार पढ़ी है इसलिए यहाँ प्रकाशित करने के लिए विजय जी आप का आभार.
  2. नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें
  3. काश! यह चाह जनजन के हृदय में उत्पन्न हो!!
  4. बहुत प्रेरणात्मक कविता ।
    सुन्दर प्रस्तुति ।
  5. प्रेरणादायक बहुत ही अच्छी कविता | हार्दिक बधाई।


नोट:-यह कविता प्रथम बार ब्रह्मपुत्र समाचार,आगरा क़े २२जन्वरी ०४ _०४ फरवरी २००४ ,अंक में प्रकाशित हुई थी.आज की परिस्थितियों में भी इन्सान की ताकत का एहसास कराती इस कविता को पुनः प्रकाशित करना उचित लगा.